Class 8 Hindi Grammar Chapter 17 समास

Class 8 Hindi Grammar Chapter 17 समास (Samaas). Practice here for CBSE and State Boards Hindi Vyakaran for Class VIII standard updated for session 2020-2021. Examples of Samaas and Samaas Vigrah with suitable explanation in simplified language.

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कक्षा 8 हिन्दी व्याकरण पाठ 17 समास और उसके भेद

कक्षा: 8हिन्दी व्याकरण
अध्याय: 17समास और समास विग्रह

समास किसे कहते हैं?

जब दो या दो से अधिक शब्द मिलकर एक संक्षिप्त शब्द का निर्माण करते हैं तो यह क्रिया समास कहलाती है। “समास” शब्द का अर्थ ही है पास रखना, छोटा करना। भाषा के प्रयोग में सामासिक शब्दों के प्रयोग से संक्षिप्तता और शैली में उत्कृष्टता एवं सटीकता आती है।
उदाहरण के लिए: “राजा का महल” कहने के स्थान पर “राजमहल” कहना अधिक उपयुक्त है। इससे स्पष्ट है कि दो या दो से अधिक शब्दों के मिलने पर ही सामासिक शब्द का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में दो या दो से अधिक पद साथ आ जाते हैं।
समास-रचना में प्रायः दो पद होते हैं। पहले पद को पूर्वपद और दूसरे पद को उत्तरपद कहते हैं। समास से बने पद को समस्तपद कहते हैं। समस्तपद के अंगों को अलग-अलग करने की प्रक्रिया को समास विग्रह कहते हैं। कुछ समास ऐसे भी होते हैं, जिनमें किसी भी पद की प्रधानता न होकर किसी अन्य पद की प्रधानता होती है।




समास के भेद

इस आधार पर समास के निम्नलिखित भेद हैं:

    • 1. अव्ययीभाव
    • 2. तत्पुरुष
    • 3. कर्मधारय
    • 4. द्विगु
    • 5. द्वंद
    • 6. बहुव्रीहि

अव्ययीभाव समास

जहाँ समस्तपद के दो खंडों में पहला अव्यय हो तथा संपूर्ण सामासिक पद भी प्रायः क्रियाविशेषण या अव्यय हो, वहाँ अव्ययीभाव समास होता है।
अव्ययीभाव का शाब्दिक अर्थ है “अव्यय हो जाना”। इस समास में पहले शब्द की प्रधानता रहती है और संपूर्णपद प्रायः क्रिया विशेषण या अव्यय के रूप में प्रयुक्त होता है। जैसे:

समस्त पदसमास विग्रह
यथाशक्तिशक्ति के अनुसार
आज्ञानुसारआज्ञा के अनुसार
यथासंभवजैसा संभव हो
यथामतिमति के अनुसार

बिना संदेह पुनरुक्ति से बनने वाले समस्तपद भी अव्ययीभाव समास होते हैं, जैसे- घर-घर, गली-गली आदि।

तत्पुरुष समास

जहाँ समस्त पद के दो खंडों के बीच से परसर्ग (न, को, के लिए आदि) का लोप हो जाता है, वहाँ तत्पुरुष समास होता है।
तत्पुरुष का शाब्दिक अर्थ है- “उसका आदमी” जैसे राजकुमार (राजा का कुमार)। यहाँ “कुमार” प्रधान है। इस समास में दूसरा शब्द प्रधान होता है। इसकी बनावट में दो शब्दों के मध्य के कारक चिह्न “का / के / को / के / लिए / की / से/ में/पर” का लोप हो जाता है।
इसके निम्नलिखित छह भेद होते हैं




(क) कर्म तत्पुरुष

इसमें कर्म की विभक्ति “को” का लोप हो जाता है। जैसे:

समस्त पदसमास विग्रह
देशगतदेश को गत
ग्रामगतग्राम को गत
गृहगतगृह को गत
परलोकगमनपरलोक को गमन,
स्वर्गप्राप्तस्वर्ग को प्राप्त
(ख) करण तत्पुरुष

इसमें करण कारक की विभक्ति “से” का लोप हो जाता है। जैसे:

समस्त पदसमास विग्रह
मुँहमाँगामुँह से माँगा
गुरुकृतगुरु के द्वारा कृत
तुलसीकृततुलसी के द्वारा कृत
हस्तलिखितहस्त से लिखित
(ग) संप्रदान तत्पुरुष

इसमें संप्रदान कारक की विभक्ति “के लिए” का लोप हो जाता है। जैसे:

समस्त पदसमास विग्रह
क्रीडाक्षेत्रक्रीड़ा के लिए क्षेत्र
यज्ञशालायज्ञ के लिए शाला
देशभक्तिदेश के लिए भक्ति
कृष्णार्पण `कृष्ण के लिए अर्पण
(घ) अपादान तत्पुरुष

इसमें अपादान कारक की विभक्ति “से” का लोप हो जाता है। जैसे:

समस्त पदसमास विग्रह
पथभ्रष्टपथ से भ्रष्ट
धर्मभ्रष्टधर्म से भ्रष्ट
पदच्युतपद से च्युत
बुद्धिहीनबुद्धि से हीन
(ङ) संबंध तत्पुरुष

इसमें संबंध कारक की विभक्ति “का/ के / की” का लोप हो जाता है। जैसे:

समस्त पदसमास विग्रह
पवनपुत्रपवन का पुत्र
यमुनातटयमुना का तट
राजपुत्रराजा का पुत्र
गंगाजलगंगा का जल
(च) अधिकरण तत्पुरुष

इसमें अधिकरण कारक की विभक्ति “में / पर” का लोप हो जाता है। जैसे:

समस्त पदसमास विग्रह
शरणागतशरण में आगत
शोकमग्नशोक में मग्न
दानवीरदान में वीर
कलाप्रवीनकला में प्रवीन




3. कर्मधारय समास

इस समास में पहला पद विशेषण और दूसरा पद विशेषण का विशेष्य होता है। जैसे- सद्गुण में दो पद हैं, सद् तथा गुण। चूंकि इसका पहला पद विशेषण है और दूसरा उसका विशेष्य है, अतः यहाँ कर्मधारय समास है। अत: जहाँ सामासिक पद के दोनों खंडों में विशेषण- विशेष्य या उपमान-उपमेय संबंध हो, वहाँ कर्मधारय समास होता है।

    • विशेषण – विशेषण बताने वाले पद। “सद्गुण” में “सद्” शब्द विशेषण है।
    • विशेष्य – जिसकी विशेषता बताई जाए। सद्गुण में “गुण” विशेष्य है।
    • उपमान – जिससे किसी की उपमा / तुलना की जाए। कमल नयन (कमल सरीखे नयन) में “कमल” उपमान है।
    • उपमेय – जिसकी उपमा / तुलना की जाए / कमलनयन (कमल सरीखे नयन) में “नयन” उपमेय है। कर्मधारय में पहला पद विशेषण या उपमावाचक होता है। जैसे:
विशेषणवाचक
समस्त पदसमास विग्रह
नीलकमलनीला कमल
महाराजमहान राजा
नृसिंहनरों में सिंह के समान
उपमावाचक
विद्याधनविद्यारूपी धन
सज्जनसत् जन
पीतांबरपीत (पीला) अंबर (वस्त्र)
नीलकंठनीला कंठ
द्विगु समास

जिस सामासिक पद का पहला पद संख्यावाचक होता है और समूह का बोध कराता है, उसे द्विगु समास कहते हैं।
जैसे- त्रिभुवन। इसमें पहला पद संख्यावाचक और दूसरा पद प्रधान है, अतः यहाँ द्विगु समास है।

समस्त पदसमास विग्रह
त्रिलोकतीन लोकों का समूह
चौमासाचार मासों का समूह
नवरात्रनौ रात्रियों का समूह

द्वंद समास

इस समास में पहला और दूसरा दोनों पद प्रधान होते हैं। दोनों पदों को मिलाते समय “और” शब्द का लोप कर दिया जाता है।
जिस समास में दोनों पद प्रधान हों तथा विग्रह करते समय दोनों पदों के बीच “और / तथा / एव / या” आदि का प्रयोग हो तो उसे द्वंद समास कहते हैं। जैसे:



समस्त पदसमास विग्रह
पाप-पुण्यपाप अथवा पुण्य
राजा- रंकराजा और रंक
गंगा-यमुनागंगा और यमुना

बहुव्रीहि समास

इस समास में कोई पद प्रधान नहीं होता है। वह अपने पदों से अलग किसी अन्य संज्ञा का विशेषण होता है जैसे- लंबोदर का अर्थ है-“गणेश” इस शब्द में “लंबा” और “उदर” दोनों पद अप्रधान हो गए हैं और अन्य शब्द “गणेश” की प्रधानता हो गई है। इसी प्रकार अन्य उदाहरण हैं

समस्त पदसमास विग्रह
चक्रधरचक्र को धारण करने वाला अर्थात् विष्णु
चंद्रशेखरचंद्र है शेखर पर जिसके अर्थात् शिव
चतुर्भुजचार भुजाएँ हैं जिसकी अर्थात् विष्णु
पीतांबरपीले हैं अंबर जिसके अर्थात् कृष्ण
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