NCERT Solutions for Class 5 Hindi Chapter 7 डाकिए की कहानी, काँवरसिंह की जुबानी

NCERT Solutions for Class 5 Hindi Chapter 7 (Rimjhim – Dakiye ki Kahani, Kanvarsing ki Jubani) डाकिए की कहानी, काँवरसिंह की जुबानी, जो की एक भेंटवार्ता है। All the question answers are given in brief format and easy to understand format.

These CBSE solutions for class 5 Hindi is updated for academic session 2021-2022. Contents are free to use without any formal registration.

Class 5 Hindi Chapter 7 Dakiye ki Kahani, Kanvarsing ki Jubani

कक्षा: 5हिंदी – रिमझिम
अध्याय: 7डाकिए की कहानी, काँवरसिंह की जुबानी

Question Answers of Chapter end Exercises

अभ्यास के प्रश्न उत्तर

डाकिये की कहानी कौन से शहर से सम्बंधित है?

डाकिये की कहानी शिमला शहर से सम्बंधित है। शिमला के माल रोड पर जनरल पोस्ट आफिस है।

कंवरसिंह कौन है? और उसके चरित्र को किस तरह से वर्णित कर सकते हैं?

कंवरसिंह एक डाकिया है, जिसकी उम्र पैंतालिस साल है तथा वह शिमला जिले के नेरवा गाँव का निवासी है। जिसको कि सरकार द्वारा उसके अच्छे काम के लिए पुरस्कार भी मिल चूका है।

डाकिये कंवरसिंह के परिवार में कौन-कौन है?

कंवरसिंह के परिवार में उसकी पत्नी और उसके चार बच्चे हैं। जिनमें तीन लड़कियां तथा एक लड़का है। दो लडकियों की शादी हो चुकी है, तथा लड़का पहाडियों से लकड़ी लाते हुए रस्ते में गिर जाने से उसकी मौत हो चुकी थी।

डाक सेवक को क्या-क्या करना होता है?

कँवरसिंह एक डाक सेवक है तो उसको बहुत सारे काम करने होते थे जैसे चिठियाँ, रजिस्ट्री पत्र, पार्सल, बिल तथा बूढ़े लोगों की पेंशन आदि लेकर गाँव-गाँव में बांटना पड़ता है।

आज सूचना के बहुत सारे साधन आ चुके हैं क्या डाकियों का काम आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है?

शहरों में आज सूचना के बहुत सारे माध्यम आ चुके हैं, जैसे फोन, मोबाइल, ई-मेल इत्यादि। लेकिन गाँव में आज भी सन्देश पहुंचाने का सबसे बड़ा साधन डाक ही है। इसलिए गाँव में आज भी डाकिये का लोग बड़ा सम्मान करते हैं। अपनी चिट्ठी आदि पाने का आज भी लोगो को इन्तजार रहता है।

कंवरसिंह अपनी नौकरी से किस प्रकार खुश था?

कंवरसिंह कहता है कि मुझे अपनी नौकरी बहुत अच्छी लगाती है। जब मैं दूर नौकरी करने वाले सिपाही का मनीआर्डर लेकर गाँव में उसके घर पहुंचता हूँ तो उसके बूढ़े माँ-बाप का ख़ुशी भरा चेहरा देखते ही बनता है। ऐसे ही जब किसी का रजिस्ट्री पात्र पंहुचाता हूँ जिसमें कभी रिजल्ट, कभी नियुक्ति पत्र होता है तो लोग बहुत खुश होते हैं। बूढ़े दादा और बूढी नानी पेंशन के पैसे मिलाने पर बहुत खुश होते हैं। छः महीने तक इसके लिए वे मेरा इंतज़ार करते हैं। हिमाचल प्रदेश में बूढ़े लोगों को छः महीने में पेंशन इकठी दी जाती है।

पहाड़ी इलाके में डाकिये का कम कितना मुश्किल भरा होता है? कंवरसिंह के शब्दों में इसका वर्णन कीजिये।

कंवरसिंह के शब्दों में पहाड़ो में डाकिये का काम मुश्किल व जोखिम भरा होता है। जब मैं किनौर जिले के रिकांगपियो में नौकरी करता था तो सुबह छः बजे मेरी डयूटी शुरू हो जाती थी। मैं छः बजे सुबह शिमला जाने वाली बस में डाक का बोरा रखता था और रात आठ बजे शिमला से आने वाली बस से डाक का बोरा उतारता था। पैकर को ये सब काम करने पड़ते हैं। किनौर और लाहौल स्पिति हिमाचल के ठन्डे तथा ऊंचाई वाले जिले हैं। इन जिलों में अप्रैल के महीने में भी बर्फवारी हो जाती है। बर्फ में चलते हुए पैरों को ठण्ड से बचाना पड़ता है। वरना स्नोबाईट हो जाता है जिससे पैर नीले पड़ जाते हैं और गैंगरीन हो जाती है। इन जिलों में मुझे एक घर से दूसरे घर तक डाक पंहुचाने के लिए २६ किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। चलाना तो खैर हमारी आदत में शुमार हो चूका है ग्रामीण डाकिये की जिंदगी में चलना ही चलना है।

कंवरसिंह के जीवन की महत्वपूर्ण घटना क्या थी?

कंवरसिंह एक घटना के बारे में बताता है। मेरा तबादला शिमला के जनरल पोस्ट ऑफिस में हो गया था। वंहा मुझे रात के समय वंहा मुझे रात के समय रेस्ट हाउस और डाकघर की चौकीदारी का काम दिया गया था। यह 1998 की बात है, 29 जनवरी को रात लभग साढ़े दस बजे का समय था। बाहर से किसी ने पोस्ट ऑफिस का दरवाजा खटखटाया। मैंने पूच्छा “कौन है”? जबाव आया “दरवाजा खोलो तुमसे बात करनी है”। मैंने दरवाजा खोला तो चार-पांच लोग अन्दर घुस आये और मेरे साथ मारपीट करने लगे साड़ी ऑफिस की लाइटें बंद कर दी उनमें से एक ने मेरे सिर पर भारी चीज से प्रहार किया और मैं बेहोश हो गया। दूसरे दिन जब होश आया तो मैं शिमला के मेडिकल कालेज अस्पताल में भर्ती था। मेरे सर में कई टाँके लगे थे जिसकी वजह से आज भी मुझे एक आँख से दिखाई नहीं देता है। सरकार ने मुझे जान पर खेल कर डाक की चीजें बचाने के लिए “बेस्ट पोस्टमैन” का पुरस्कार दिया। यह ईनाम 2004 में मिला। इस ईनाम में 500 रुपये और प्रशस्ति पात्र दिया जाता है। मैं और मेरा परिवार बहुत खुश हुए। आज भी मैं गर्व से कहता हूँ : “मैं बेस्ट पोस्टमैन हूँ”।

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